Friday, March 12, 2010

ये कैसे गुरुजी


प्यार और दुलार से पत्थर दिल भी समझ जाते हैं, पर इन गुरुजी को कौन समझाए। इन्होंने आव देखा न ताउ और हो गए शुरू। ये पता नहीं किस का तैश अपने शिष्य पर उतार रहे हैं।
कबीर जी ने कहा है
गुरु कुम्हार शिश कुम्भ है गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट ।
अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहे चोट ॥
पर इस तरह मुर्गा बनाकर लात-घूसों से इतना नहीं मारना चाहिए कि वह कराह ही उठे। यह बेचारा रोजाना स्कूल न जाने का कसूरवार था। समझाने-बुझाने के बजाए क्या इस बच्चे की इतनी निर्दयता से पिटाई करना उचित है। क्या इस पिटाई के बाद वह स्कूल जाने लगेगा।

2 Comments:

At March 12, 2010 at 4:45 AM , Blogger Udan Tashtari said...

ये तो बहुत बुरी तरह सुताई चल रही है. मास्साब हैं कि राक्षस..अमानवीय!!

 
At May 16, 2011 at 10:23 AM , Blogger जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

इस गुरुजी को भी दो, एक जोर की लात तब समझ में आयेगी इनके बात

 

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