Saturday, August 16, 2008

पड़ोसी की सोच

हम इसलिए नहीं दुखी हैं कि हमें दुख है।
हमें दुख तो इस बात का है कि पड़ोसी खुश है।।

पड़ोसी मुल्क की भी है शायद यहीं है सोच।
नहीं तो आए दिन क्यों तोड़ता संघर्ष विराम।।

2 Comments:

At August 16, 2008 at 10:41 PM , Blogger राजीव रंजन प्रसाद said...

पडोसी को तो इंतजार ही रहता है कि कब हमारे घर के बरतन ढनके और वह सक्रिय हो..

 
At August 16, 2008 at 11:10 PM , Blogger सचिन मिश्रा said...

टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

 

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